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गया में पुलिस पर SC/ST एक्ट का केस, कोर्ट के आदेश से 10 पुलिसकर्मियों पर FIR

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गया के पंचानपुर थाना क्षेत्र में 63 वर्षीय महिला की शिकायत पर कोर्ट के आदेश से दो पुलिस अधिकारियों समेत 10 पुलिसकर्मियों पर SC/ST एक्ट के तहत मामला दर्ज किया गया है। आरोपों में मारपीट, अभद्रता और जातिसूचक टिप्पणी शामिल हैं।

गया/आलम की खबर:बिहार के गया जिले से पुलिस विभाग को लेकर एक गंभीर मामला सामने आया है, जहां कोर्ट के आदेश पर पुलिस अधिकारियों और जवानों के खिलाफ एससी-एसटी एक्ट के तहत प्राथमिकी दर्ज की गई है। इस कार्रवाई ने एक बार फिर पुलिस कार्यशैली और आम लोगों के साथ व्यवहार को लेकर कई सवाल खड़े कर दिए हैं। मामला पंचानपुर थाना क्षेत्र के चैनपुरा गांव से जुड़ा है, जहां एक 63 वर्षीय महिला ने पुलिस टीम पर घर में घुसकर मारपीट, अभद्र व्यवहार और जातिसूचक टिप्पणी करने जैसे गंभीर आरोप लगाए हैं।

बताया जा रहा है कि गया सिविल कोर्ट के निर्देश के बाद एससी-एसटी थाना में तत्कालीन थानाध्यक्ष कन्हैया कुमार, दारोगा चतुरानंद पांडे समेत दो अधिकारियों और कुल 10 पुलिसकर्मियों के खिलाफ मामला दर्ज किया गया है। इसके अलावा करीब 30 अज्ञात लोगों को भी केस में शामिल किया गया है। कोर्ट के आदेश के बाद दर्ज हुई इस प्राथमिकी ने पुलिस महकमे में हलचल बढ़ा दी है।

पीड़ित महिला के अनुसार, घटना 17 अक्टूबर 2024 की रात की है। आरोप है कि देर रात करीब साढ़े ग्यारह बजे पुलिस उनके बेटे की तलाश में घर पहुंची थी। परिवार के लोगों ने पुलिस को बताया कि उनका बेटा घर पर मौजूद नहीं है, लेकिन इसके बावजूद पुलिसकर्मियों ने कथित तौर पर जबरन दरवाजा तोड़कर घर में प्रवेश किया। महिला का आरोप है कि पुलिस टीम ने घर में मौजूद लोगों के साथ बर्बरता की और महिलाओं के साथ भी अभद्र व्यवहार किया।

परिवार का कहना है कि पुलिसकर्मियों ने कार्रवाई के दौरान जातिसूचक शब्दों का इस्तेमाल किया और पूरे परिवार को डराने-धमकाने की कोशिश की। आरोप यह भी है कि पुलिसकर्मियों ने घर में मौजूद पुरुषों और महिलाओं के साथ मारपीट की। पीड़ित पक्ष के मुताबिक, उस रात गांव में भय और तनाव का माहौल बन गया था।

मामले में सबसे गंभीर आरोप महिला के बेटे राजनंदन पासवान के साथ कथित मारपीट और गला दबाकर हत्या की कोशिश का लगाया गया है। परिजनों का कहना है कि पुलिस तीन बेटों को पकड़कर थाने ले गई, जहां उनके साथ अमानवीय व्यवहार किया गया। परिवार ने आरोप लगाया कि पुलिस कार्रवाई के नाम पर अत्यधिक बल प्रयोग किया गया और मानवाधिकारों की अनदेखी की गई।

घटना के बाद पीड़ित परिवार ने न्याय के लिए कोर्ट का दरवाजा खटखटाया। लंबे इंतजार और कानूनी प्रक्रिया के बाद कोर्ट ने मामले को गंभीर मानते हुए प्राथमिकी दर्ज करने का आदेश दिया। इसके बाद 7 मई को एससी-एसटी थाना में केस दर्ज किया गया। इस पूरे घटनाक्रम ने यह सवाल भी खड़ा किया है कि यदि पीड़ित परिवार कोर्ट नहीं पहुंचता तो क्या मामला दर्ज हो पाता।

जानकारी के अनुसार, जिन अधिकारियों और पुलिसकर्मियों पर मामला दर्ज हुआ है, वे फिलहाल अलग-अलग जिलों में तैनात हैं। तत्कालीन थानाध्यक्ष कन्हैया कुमार वर्तमान में अरवल जिले में पदस्थापित बताए जा रहे हैं, जबकि दारोगा चतुरानंद पांडे की तैनाती दरभंगा जिले में है। अन्य नामजद पुलिसकर्मी भी विभिन्न थानों में अपनी सेवाएं दे रहे हैं।

एससी-एसटी थाना के थानाध्यक्ष कमलेश राम ने मामले की पुष्टि करते हुए कहा कि कोर्ट के आदेश के अनुपालन में प्राथमिकी दर्ज की गई है और पूरे मामले की गंभीरता से जांच की जा रही है। उन्होंने कहा कि जांच के दौरान सभी पक्षों के बयान लिए जाएंगे और जो भी तथ्य सामने आएंगे, उसके आधार पर आगे की कानूनी कार्रवाई की जाएगी।

यह मामला ऐसे समय सामने आया है जब बिहार पुलिस लगातार जनमित्र पुलिसिंग और संवेदनशील व्यवहार की बात कर रही है। लेकिन इस तरह के आरोप पुलिस की छवि पर सीधा असर डालते हैं। विशेष रूप से अनुसूचित जाति और कमजोर वर्गों से जुड़े मामलों में पुलिस पर लगे आरोप समाज में असुरक्षा और अविश्वास की भावना पैदा करते हैं।

कानूनी जानकारों का मानना है कि एससी-एसटी एक्ट के मामलों को बेहद गंभीरता से देखा जाता है और यदि आरोप सही साबित होते हैं तो संबंधित अधिकारियों के खिलाफ कड़ी कार्रवाई संभव है। वहीं दूसरी ओर, पुलिस विभाग के लिए भी यह मामला चुनौतीपूर्ण माना जा रहा है क्योंकि इसमें विभाग के अपने ही कर्मियों पर गंभीर आरोप लगे हैं।

फिलहाल पूरे मामले की जांच जारी है और अब सबकी नजर इस बात पर टिकी है कि जांच में क्या तथ्य सामने आते हैं और प्रशासन इस मामले में कितनी निष्पक्षता के साथ कार्रवाई करता है। पीड़ित परिवार न्याय की उम्मीद लगाए बैठा है, जबकि पुलिस विभाग के लिए यह मामला जवाबदेही और संवेदनशीलता की बड़ी परीक्षा बन गया है।

संपादकीय: कानून के रक्षक ही कटघरे में हों तो सवाल उठना स्वाभाविक

गया में पुलिस अधिकारियों और जवानों पर एससी-एसटी एक्ट के तहत मामला दर्ज होना केवल एक कानूनी घटना नहीं, बल्कि व्यवस्था पर उठे गंभीर सवाल का संकेत है। जब आम नागरिक पुलिस पर घर में घुसकर मारपीट, अभद्र व्यवहार और जातिसूचक टिप्पणी जैसे आरोप लगाते हैं, तो मामला सिर्फ एक परिवार तक सीमित नहीं रहता, बल्कि पूरे पुलिस तंत्र की कार्यशैली पर बहस शुरू हो जाती है।

पुलिस को समाज में कानून का सबसे मजबूत स्तंभ माना जाता है। अपराध रोकना, लोगों की सुरक्षा करना और न्याय व्यवस्था को मजबूत बनाना उसकी जिम्मेदारी है। लेकिन जब वही पुलिस विवादों में घिरती है, तो आम लोगों का भरोसा कमजोर पड़ने लगता है। खासकर अनुसूचित जाति और कमजोर वर्गों से जुड़े मामलों में संवेदनशीलता और जवाबदेही की अपेक्षा और भी अधिक होती है। ऐसे मामलों में यदि आरोप सही पाए जाते हैं, तो यह केवल विभागीय गलती नहीं बल्कि सामाजिक विश्वास को चोट पहुंचाने वाली स्थिति बन जाती है।

इस पूरे मामले में सबसे महत्वपूर्ण बात यह है कि प्राथमिकी कोर्ट के आदेश के बाद दर्ज हुई। यह स्थिति कई सवाल खड़े करती है। क्या पीड़ित परिवार को न्याय पाने के लिए अदालत का दरवाजा खटखटाने की मजबूरी होनी चाहिए? क्या पुलिस तंत्र के भीतर शिकायतों की निष्पक्ष सुनवाई की व्यवस्था पर्याप्त मजबूत है? ये ऐसे सवाल हैं जिन पर गंभीर मंथन की जरूरत है।

हालांकि, किसी भी मामले में अंतिम सत्य जांच और न्यायिक प्रक्रिया के बाद ही सामने आता है। इसलिए यह भी जरूरी है कि जांच पूरी निष्पक्षता और पारदर्शिता के साथ हो। यदि आरोप गलत हैं तो सच्चाई सामने आनी चाहिए और यदि आरोप सही साबित होते हैं तो जिम्मेदार लोगों पर कठोर कार्रवाई भी होनी चाहिए। कानून की विश्वसनीयता तभी बनी रहती है जब वह वर्दी और आम आदमी के बीच भेदभाव न करे।

आज जरूरत सिर्फ “सख्त पुलिसिंग” की नहीं, बल्कि “संवेदनशील पुलिसिंग” की भी है। जनता पुलिस से डर नहीं, भरोसा चाहती है। और यही भरोसा किसी भी लोकतांत्रिक व्यवस्था की सबसे बड़ी ताकत होता है।

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